समीक्षक- नेहा शर्मा
समीक्षक कृति- नजरों के सामने
"यथार्थ जीवन की संवेदनापूर्ण झलकियाँ : नजरों के सामने"
पुस्तक का नाम : नजरों के सामने
कवि : जनकराज शर्मा
विधा : काव्य
प्रथम संस्करण - 2021
लेखकीय पता- मोचीवाली (डिंग) सिरसा, हरियाणा, 125055
सम्पर्क सूत्र- 9416491566
प्रकाशक- मोनिका प्रकाशन, दिल्ली
पृष्ठ संख्या- 120
मूल्य- 400
मोचीवाली (डिंग) सिरसा (हरियाणा) निवासी जनक राज शर्मा जी विराट व्यक्तित्व के यशस्वी साहित्यकार है। साथ ही ये प्रकृति प्रेमी भी है। मुझे इनका काव्य संग्रह "नजरों के सामने" पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। प्रस्तुत काव्य संग्रह में कवि ने सामाजिक, आध्यात्मिक, भावनात्मक, व्यक्तिगत कल्याण, प्राकृतिक सौंदर्य आदि विभिन्न भावों से संबंधित 51 कविताओं का समावेश किया है। इन 51 कविताओं में कवि ने अपने हृदय के भाव को माला के सुंदर व बहुमूल्य मोतियों की तरह पिरोया है। कवि की मनोदशा उनका अपना अनुभव और व्यक्तित्व संग्रह की कविताओं के माध्यम से व्यक्त होता है। संकलन की कविताएं सरल, सहज, व्यवस्थित एवं प्रभावशाली भाषा शैली में रचित है।
प्रकाशित काव्य संग्रह "नजरों के सामने" की प्रथम कविता "प्रार्थना" में
ना दीन दुखी हो कोई भी/ हर प्राणी रोग से दूर रहे/ धन - धान्य भरा हो हर घर में/ खुशियों से मन भरपूर रहे/
प्रस्तुत कविता की पंक्तियों में कवि ने परम पिता परमेश्वर से प्रार्थना की हैं कि मनुष्य के जीवन से हर दुखमय अध्याय का अंत हो, सुख समृद्धि का उजाला चारों ओर फैले। कवि प्रार्थना की शक्ति से समाज में नव चेतना जागृत करना चाहते हैं।
पिता ने त्याग दी अपनी जन्मभूमि/ निकल पड़े थे दोनों/ शहर की ओर/ अनजाने लोगों के बीच/ जहां लोग/ पहचाने उन्हें/ सिर्फ उनके/ कर्म से/
उपर्युक्त पंक्तियों में कवि ने प्रचलित जाति व्यवस्था जैसी विकराल सामाजिक बुराई पर आक्षेप किया है। वर्षों से निम्न जाति कहे जाने वाले लोग छुआछूत, अपमानजनक एवं जातिसूचक शब्दों के कड़वे घूंट भरते आए हैं। कहा जाता है कि वैदिक धर्म में जातिवाद के लिए कोई स्थान नहीं था। व्यक्ति अपने कर्म से महान बनता है, ना की जाति या जन्म से। आचरण कर्म बदलने से शुद्ध ब्राह्मण हो सकता है और ब्राह्मण शुद्र। प्राचीन सामाजिक जातिगत रूढ़ीवादी मान्यताओं के चलते पिता-पुत्र को अपनी जन्म भूमि त्यागने के लिए विवश होना पड़ता है। कवि ने इसका मार्मिक विवेचन किया है।
जिस टेंट को/ सजाने में/ लगते हैं हफ्ते/ वह दिखता है/ उजड़ी बस्ती- सा/ जैसे एक बार फिर/ लूटा हो/ किसी गजनी ने/ सोमनाथ के मंदिर को/
विवाह भारतीय समाज में परंपरा के रूप में महत्वपूर्ण व पवित्र स्थान रखता है। लेकिन वर्तमान आधुनिक चकाचौंध, दिखावे की ओछी, संकुचित प्रवृत्ति भारतीय धर्म- मान्यताओं से ही नहीं बल्कि प्रकृति व पशु- संपदा से भी खिलवाड़ कर रही है। मन को अप्रिय लगने वाले तेज ध्वनि के भड़कीले संगीत, पटाखों के असहनीय शोर व धुआँ विवाह के इस मांगलिक बेला पर किसी अपशगुन की गहरी काली छाया प्रतीत होते है। विवाह के समाप्ति तक का दृश्य किसी तीव्र बवंडर के अंत का परिणाम नजर आता है।
उसे नहीं है परवाह/शारीरिक सौंदर्य की/ उसे चिंता है रिश्तों को निभाने की/
प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने भारतीय नारी की छवि को प्रदर्शित किया है, जो अपने परिवार रिश्ते नातों को निभाने के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर देती है। अपनों की खुशी में अपने को खुश कर लेती है।
कविता "नजरों के सामने", "कनक महल", "मान कैसा", "अपने", "मेहमान हूं मैं", "मेरा वजूद", "नर पतंग", "बेटी", "मातृ दिवस", "गुरु शिष्य परंपरा", "अभी वक्त है", "बदलाव" ,"बंद बोरा", "पंखों की छतरी", "कलाकार", "वह उजाले वाला", "शक्ति विश्वास की", "ज्यादा ना रखना", "अब वह वक्त कहां", "सुख स्वप्न का" आदि कविताएं सामाजिक मानव मूल्यों एवं भाव की सशक्त लहरी है। उपर्युक्त कविताएं कवि के मन की विशेष भाव श्रृंखला की सुंदर अभिव्यक्ति है। लय तुक, शब्द चयन, भाषा शैली सुव्यवस्थित, रोचक एवं प्रवाहमयी है।
"अमी बरसे " शीर्षक की कविता की बानगी प्रस्तुत है-
अमी बरसे/ बूंदे वर्षा की रिमझिम - रिमझिम /लगी गिरने / कण- कण मुस्काता/ नजर आता/
प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने बरसात के मौसम का मनोहारी वर्णन किया है। आकाश से गिर रही बरसात की छोटी बूंदे धरा के कण-कण को तृप्त कर रही है। बरसात का यह मनोरम, हरियाला दृश्य कवि अपनी आंखों में कैद कर लेना चाहते है।
जनक राज शर्मा जी का काव्य संग्रह नजरों के सामने "यथार्थ जीवन की संवेदनापूर्ण झलकियाँ " प्रस्तुत करता है। कवि ने प्रकाशित कविता संकलन में समाज का सच्चा स्वरूप प्रस्तुत किया है। संग्रह कि सहज, सरल, बोधगम्य भाषा शैली पाठक को अपनी ओर आकर्षित करती है। ईश्वर से कामना है कि आपका यह काव्य संग्रह समाज का पथ प्रदर्शक बने और आप ऐसी अनेक साहित्यिक पुस्तकों की रचना करते रहें। मां शारदे की असीम कृपा आप पर बनी रहें।
शुभकामनाओं सहित
नेहा शर्मा
पुस्तक का नाम : नजरों के सामने
कवि : जनकराज शर्मा
विधा : काव्य
प्रथम संस्करण - 2021
लेखकीय पता- मोचीवाली (डिंग) सिरसा, हरियाणा, 125055
सम्पर्क सूत्र- 9416491566
प्रकाशक- मोनिका प्रकाशन, दिल्ली
पृष्ठ संख्या- 120
मूल्य- 400
मोचीवाली (डिंग) सिरसा (हरियाणा) निवासी जनक राज शर्मा जी विराट व्यक्तित्व के यशस्वी साहित्यकार है। साथ ही ये प्रकृति प्रेमी भी है। मुझे इनका काव्य संग्रह "नजरों के सामने" पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। प्रस्तुत काव्य संग्रह में कवि ने सामाजिक, आध्यात्मिक, भावनात्मक, व्यक्तिगत कल्याण, प्राकृतिक सौंदर्य आदि विभिन्न भावों से संबंधित 51 कविताओं का समावेश किया है। इन 51 कविताओं में कवि ने अपने हृदय के भाव को माला के सुंदर व बहुमूल्य मोतियों की तरह पिरोया है। कवि की मनोदशा उनका अपना अनुभव और व्यक्तित्व संग्रह की कविताओं के माध्यम से व्यक्त होता है। संकलन की कविताएं सरल, सहज, व्यवस्थित एवं प्रभावशाली भाषा शैली में रचित है।
प्रकाशित काव्य संग्रह "नजरों के सामने" की प्रथम कविता "प्रार्थना" में
ना दीन दुखी हो कोई भी/ हर प्राणी रोग से दूर रहे/ धन - धान्य भरा हो हर घर में/ खुशियों से मन भरपूर रहे/
प्रस्तुत कविता की पंक्तियों में कवि ने परम पिता परमेश्वर से प्रार्थना की हैं कि मनुष्य के जीवन से हर दुखमय अध्याय का अंत हो, सुख समृद्धि का उजाला चारों ओर फैले। कवि प्रार्थना की शक्ति से समाज में नव चेतना जागृत करना चाहते हैं।
पिता ने त्याग दी अपनी जन्मभूमि/ निकल पड़े थे दोनों/ शहर की ओर/ अनजाने लोगों के बीच/ जहां लोग/ पहचाने उन्हें/ सिर्फ उनके/ कर्म से/
उपर्युक्त पंक्तियों में कवि ने प्रचलित जाति व्यवस्था जैसी विकराल सामाजिक बुराई पर आक्षेप किया है। वर्षों से निम्न जाति कहे जाने वाले लोग छुआछूत, अपमानजनक एवं जातिसूचक शब्दों के कड़वे घूंट भरते आए हैं। कहा जाता है कि वैदिक धर्म में जातिवाद के लिए कोई स्थान नहीं था। व्यक्ति अपने कर्म से महान बनता है, ना की जाति या जन्म से। आचरण कर्म बदलने से शुद्ध ब्राह्मण हो सकता है और ब्राह्मण शुद्र। प्राचीन सामाजिक जातिगत रूढ़ीवादी मान्यताओं के चलते पिता-पुत्र को अपनी जन्म भूमि त्यागने के लिए विवश होना पड़ता है। कवि ने इसका मार्मिक विवेचन किया है।
जिस टेंट को/ सजाने में/ लगते हैं हफ्ते/ वह दिखता है/ उजड़ी बस्ती- सा/ जैसे एक बार फिर/ लूटा हो/ किसी गजनी ने/ सोमनाथ के मंदिर को/
विवाह भारतीय समाज में परंपरा के रूप में महत्वपूर्ण व पवित्र स्थान रखता है। लेकिन वर्तमान आधुनिक चकाचौंध, दिखावे की ओछी, संकुचित प्रवृत्ति भारतीय धर्म- मान्यताओं से ही नहीं बल्कि प्रकृति व पशु- संपदा से भी खिलवाड़ कर रही है। मन को अप्रिय लगने वाले तेज ध्वनि के भड़कीले संगीत, पटाखों के असहनीय शोर व धुआँ विवाह के इस मांगलिक बेला पर किसी अपशगुन की गहरी काली छाया प्रतीत होते है। विवाह के समाप्ति तक का दृश्य किसी तीव्र बवंडर के अंत का परिणाम नजर आता है।
उसे नहीं है परवाह/शारीरिक सौंदर्य की/ उसे चिंता है रिश्तों को निभाने की/
प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने भारतीय नारी की छवि को प्रदर्शित किया है, जो अपने परिवार रिश्ते नातों को निभाने के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर देती है। अपनों की खुशी में अपने को खुश कर लेती है।
कविता "नजरों के सामने", "कनक महल", "मान कैसा", "अपने", "मेहमान हूं मैं", "मेरा वजूद", "नर पतंग", "बेटी", "मातृ दिवस", "गुरु शिष्य परंपरा", "अभी वक्त है", "बदलाव" ,"बंद बोरा", "पंखों की छतरी", "कलाकार", "वह उजाले वाला", "शक्ति विश्वास की", "ज्यादा ना रखना", "अब वह वक्त कहां", "सुख स्वप्न का" आदि कविताएं सामाजिक मानव मूल्यों एवं भाव की सशक्त लहरी है। उपर्युक्त कविताएं कवि के मन की विशेष भाव श्रृंखला की सुंदर अभिव्यक्ति है। लय तुक, शब्द चयन, भाषा शैली सुव्यवस्थित, रोचक एवं प्रवाहमयी है।
"अमी बरसे " शीर्षक की कविता की बानगी प्रस्तुत है-
अमी बरसे/ बूंदे वर्षा की रिमझिम - रिमझिम /लगी गिरने / कण- कण मुस्काता/ नजर आता/
प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने बरसात के मौसम का मनोहारी वर्णन किया है। आकाश से गिर रही बरसात की छोटी बूंदे धरा के कण-कण को तृप्त कर रही है। बरसात का यह मनोरम, हरियाला दृश्य कवि अपनी आंखों में कैद कर लेना चाहते है।
जनक राज शर्मा जी का काव्य संग्रह नजरों के सामने "यथार्थ जीवन की संवेदनापूर्ण झलकियाँ " प्रस्तुत करता है। कवि ने प्रकाशित कविता संकलन में समाज का सच्चा स्वरूप प्रस्तुत किया है। संग्रह कि सहज, सरल, बोधगम्य भाषा शैली पाठक को अपनी ओर आकर्षित करती है। ईश्वर से कामना है कि आपका यह काव्य संग्रह समाज का पथ प्रदर्शक बने और आप ऐसी अनेक साहित्यिक पुस्तकों की रचना करते रहें। मां शारदे की असीम कृपा आप पर बनी रहें।
शुभकामनाओं सहित
नेहा शर्मा
उत्कृष्ट समीक्षा हार्दिक शुभकामनाएं
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