सोमवार, 8 नवंबर 2021

"मन के विविध भावों को दर्शाता काव्य संग्रह - आहटें अंतर्मन की"



समीक्ष्य कृति :  आहटें अंतर्मन की
लेखक  :  पवन मित्तल
विधा : काव्य
प्रकाशक : मोनिका प्रकाशन,दिल्ली
प्रथम संस्करण :  2021.
मूल्य : ₹ 450/-
पृष्ठ-136

समीक्षक- नेहा शर्मा


"मन के विविध भावों को दर्शाता काव्य संग्रह -  आहटें अंतर्मन की"



" आहटें अंतर्मन" की कर्मठ व बहुमुखी प्रतिभा के धनी साहित्यकार पवन मित्तल जी का दूसरा काव्य संग्रह है। 109  कविताओं का यह काव्य संग्रह समाज के हर आयाम को गति प्रदान करता है। काव्य कृति में मां की ममता, देशभक्ति की भावना, रक्तदान, नेत्रदान, ग्रामीण परिवेश, धूम्रपान, भारतीय तीज- त्योहार की सोंधी महक, प्राकृतिक परिवेश का सुंदर चित्रण, नारी की पीड़ा आदि भावों का समावेश किया गया है। संकलन में सम्मिलित सभी कविताएं यथार्थ जीवन से उपजी हुई प्रतीत होती हैं। समाज का कोई भी छोर कवि की कलम से अछूता नहीं रह पाया है।

काव्य संकलन की प्रथम कविता "मां तेरा छोर नहीं" में
इन हाथों की थाप पाकर/ बन गया निशा से प्रभाकर/ तेरी तपस्या जीवन का मूल/ है शांति कहीं भी शोर नहीं/

उपर्युक्त पंक्तियां मन को झंकृत कर देती है। मां अपनी संतान को कच्चे घड़े से तराश कर पूर्ण आकार प्रदान करती है।माँ बच्चे के लिए पहली शिक्षिका होती है, जो जीवन की अच्छी या बुरी चीजों के बारे में सिखाती है।एक मां संपूर्ण जीवन निस्वार्थ भाव से अपना सर्वस्व संतान पर लुटाती रहती है।

"गांव का घर" शीर्षक कविता की एक बानगी प्रस्तुत है-
शायद पुरखों की आत्माएं/ और वो बीता बालपन उस आंगन की छवि  को/ होने नहीं देता धूमिल /

प्रस्तुत पंक्तियों में कवि का0अपने पुश्तैनी मकान के प्रति असीम लगाव  प्रदर्शित हुआ है, जो शहर में रहने के बाद भी अपने बचपन व पूर्वजों का ख्याल उन्हें विचलित कर देता है। वास्तव में व्यक्ति चाहे दुनिया के किसी भी कोने में क्यों ना चला जाए लेकिन जहां उसका बचपन बीता जिस मिट्टी में खेलते हुए वह बड़ा हुआ उसे सदैव अपने हृदय में सहेज कर रखता है।

कविता "नारी तू कमजोर नहीं" में
मै पूछना चाहती हूं कि/ क्या इस समाज में मेरा कोई अस्तित्व है/ या में बनी रहूंगी सदियों से सदियों तक/ तुम्हारे हाथों की कठपुतली/

उपर्युक्त पंक्तियों में नारी की मनःस्थिति का मार्मिक चित्रण प्रस्तुत किया गया है। नारी सदियों से रूढ़ीवादी बंधनों में जकड़ी रही है। सदैव नारी का शोषण होता रहा है । प्राचीन काल से आर्थिक, सामाजिक, साहित्यिक, धार्मिक सभी क्षेत्रों में नारी की अपेक्षा पुरूष का आधिपत्य रहा है। पुरुष ने अपने पुरुषत्व की श्रेष्ठता स्थापित करने के लिए स्त्री जाति पर मनमाने अत्याचार किए।

"पानी" शीर्षक कविता की बानगी प्रस्तुत है-
वो जल सेवा में/ रखवाये गए पानी के घड़े/ प्याऊ चढ़
गए भेट/ बाजारवाद की /अब खरीद कर /पीना पड़ता है पानी /जो कि हस्ताक्षर है/ बदलाव का /

उपर्युक्त कविता मे जल की अनमोल बूंद पर भी बाजारवाद का हावी होना दृष्टिगोचर हुआ है । आज से कुछ वर्षों पहले राहगीरों की आत्म तृप्ति हेतु प्याऊ पर जल के घड़े रखना पुण्य का कार्य समझा जाता था। लेकिन वर्तमान में बाजारवाद के कारण जल को बेचा जा रहा है। इंसानों की स्वार्थी प्रवृत्ति ने जीवनदायिनी जल की बूंद को भी उपभोक्तावाद व बाजारवाद का शिकार बना दिया है।


"रक्तदान का सफर" , "सूर्य की यात्रा", "वर्षा से गुहार", "छत" , "साहित्यकार",  "बेटी",  "जय भारत", "वक्त की गति", "मै तालाब", "बेनाम श्रम", " उदासीनता", "आंकड़े", "गति", "अवधारणा", "बेटी की पुकार" "पीड़ा" आदि सभी कविताएं सरल, सहज व सुव्यवस्थित ढंग से अभिव्यक्त की गई है। सभी कविताएं नव जागृति से प्रेरित व पाठक पर अपना अविस्मरणीय प्रभाव छोड़ती है। कविताओं में भाव - श्रृंखला की सुगम अभिव्यक्ति हुई है।

"राष्ट्रीय एकता" कविता में होगा स्वप्न साकार राष्ट्रीय एकता का / करने होंगे हम सभी को संयुक्त प्रयास/  कि  समाज का कोई भी वर्ग/ स्वयं को राष्ट्र से अलग न समझे /

प्रस्तुत कविता में अखंड भारत के सुखद स्वप्न का वर्णन किया है। सदियों से भारत देश मे सभी जाति व धर्म के लोग प्रेम व भाईचारे के सूत्र में बंध कर जीवनयापन करते चले आ रहे थे।लेकिन अंग्रेजों की कुटिल कूटनीति के चलते भारत भूमि के दो टुकड़े हो गए। इसके पश्चात सांप्रदायिक दंगों का जहरीला नाग अपने फन फहराने लगा, जोअभी तक सक्रिय हैं। राष्ट्रीय एकता की भावना को जीवंत रखने के लिए हम सभी को जाति, धर्म, संप्रदाय जैसे संकुचित भावना से ऊपर उठकर आपसी सहयोग करना होगा।

साहित्यकार पवन मित्तल जी का काव्य संग्रह  "आहटें अंतर्मन की"  मन के विविध भावों को दर्शाता है। कवि ने काव्य कृति में अपने मन की भावनाओं को व्यक्त करने का प्रयास किया है । नवप्रकाशित काव्य संकलन को संगतिपूर्ण शब्दों के माध्यम से व्यवस्थित किया गया है। कवि ने सामाजिक, सांस्कृतिक,  विचारात्मक व भावनात्मक आदि विषयों पर अपनी लेखनी चलाई है। प्रस्तुत काव्य संग्रह में रचित कविताएं हमारे जीवन में, समाज में व वर्तमान संदर्भो में अपनी उपयोगिता को दर्शाती है। ईश्वर से कामना है कि आपका यह कविता संकलन राष्ट्र व समाज के लिए मार्गदर्शक बने। विद्यादायिनी मां शारदे की कृपा बनी रहे।

शुभकामनाओं सहित

नेहा शर्मा 

रविवार, 5 सितंबर 2021

यथार्थ जीवन की संवेदनापूर्ण झलकियां - "नजरों के सामने "

      
    समीक्षक-  नेहा शर्मा 
    समीक्षक कृति- नजरों के सामने 


"यथार्थ जीवन की संवेदनापूर्ण झलकियाँ : नजरों के सामने" 

पुस्तक का नाम  :  नजरों के सामने
कवि : जनकराज शर्मा
विधा : काव्य
प्रथम संस्करण - 2021

लेखकीय पता- मोचीवाली (डिंग) सिरसा, हरियाणा,  125055
सम्पर्क सूत्र- 9416491566

प्रकाशक- मोनिका प्रकाशन, दिल्ली
पृष्ठ संख्या- 120
मूल्य- 400


मोचीवाली (डिंग) सिरसा (हरियाणा) निवासी जनक राज शर्मा जी विराट व्यक्तित्व के यशस्वी साहित्यकार है। साथ ही ये प्रकृति प्रेमी भी है। मुझे इनका काव्य संग्रह "नजरों के सामने" पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। प्रस्तुत काव्य संग्रह में कवि ने सामाजिक, आध्यात्मिक, भावनात्मक, व्यक्तिगत कल्याण, प्राकृतिक सौंदर्य आदि विभिन्न भावों से संबंधित 51 कविताओं का समावेश किया है। इन 51 कविताओं में कवि ने अपने हृदय के भाव को माला के सुंदर व बहुमूल्य मोतियों की तरह पिरोया है। कवि की मनोदशा उनका अपना अनुभव और व्यक्तित्व संग्रह की कविताओं के माध्यम से व्यक्त होता है। संकलन की कविताएं सरल, सहज, व्यवस्थित एवं  प्रभावशाली भाषा शैली में रचित है।

प्रकाशित काव्य संग्रह "नजरों के सामने" की प्रथम कविता "प्रार्थना" में
ना दीन दुखी हो कोई भी/ हर प्राणी रोग से दूर रहे/ धन -  धान्य भरा हो हर घर में/ खुशियों से मन भरपूर रहे/ 

प्रस्तुत कविता की पंक्तियों में कवि ने परम पिता परमेश्वर से प्रार्थना की हैं कि मनुष्य के जीवन से हर दुखमय अध्याय का अंत हो, सुख समृद्धि का उजाला चारों ओर फैले। कवि प्रार्थना की शक्ति से समाज में नव चेतना जागृत करना चाहते हैं।

पिता ने त्याग दी अपनी जन्मभूमि/ निकल पड़े थे दोनों/ शहर की ओर/ अनजाने लोगों के बीच/ जहां लोग/ पहचाने उन्हें/ सिर्फ उनके/ कर्म से/  
उपर्युक्त पंक्तियों में कवि ने प्रचलित जाति व्यवस्था जैसी विकराल सामाजिक बुराई पर आक्षेप किया है। वर्षों से निम्न जाति कहे जाने वाले लोग छुआछूत, अपमानजनक एवं जातिसूचक शब्दों के कड़वे घूंट भरते  आए हैं। कहा जाता है कि वैदिक धर्म में जातिवाद के लिए कोई स्थान नहीं था। व्यक्ति अपने कर्म से महान बनता है, ना की जाति या जन्म से। आचरण कर्म बदलने से शुद्ध ब्राह्मण हो सकता है और ब्राह्मण शुद्र। प्राचीन सामाजिक जातिगत रूढ़ीवादी मान्यताओं के चलते पिता-पुत्र को अपनी जन्म भूमि त्यागने के लिए विवश होना पड़ता है। कवि ने इसका मार्मिक विवेचन किया है।

जिस टेंट को/ सजाने में/ लगते हैं हफ्ते/ वह दिखता है/ उजड़ी बस्ती- सा/ जैसे एक बार फिर/ लूटा हो/ किसी गजनी ने/ सोमनाथ के मंदिर को/

विवाह भारतीय समाज में परंपरा के रूप में महत्वपूर्ण व पवित्र स्थान रखता है। लेकिन वर्तमान आधुनिक चकाचौंध, दिखावे की ओछी,  संकुचित प्रवृत्ति भारतीय धर्म- मान्यताओं से ही नहीं बल्कि प्रकृति व पशु- संपदा से भी खिलवाड़ कर रही है। मन को अप्रिय लगने वाले तेज ध्वनि के भड़कीले संगीत, पटाखों के असहनीय शोर व धुआँ विवाह के इस मांगलिक बेला पर किसी अपशगुन की गहरी काली छाया प्रतीत होते है। विवाह के समाप्ति तक का दृश्य किसी तीव्र बवंडर के अंत का परिणाम नजर आता है।

उसे नहीं है परवाह/शारीरिक सौंदर्य की/ उसे चिंता है रिश्तों को निभाने की/

प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने भारतीय नारी की छवि को प्रदर्शित किया है, जो अपने परिवार रिश्ते नातों को निभाने के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर देती है। अपनों की खुशी में अपने को खुश कर लेती है।

कविता "नजरों के सामने", "कनक महल", "मान कैसा", "अपने", "मेहमान हूं मैं", "मेरा वजूद", "नर पतंग", "बेटी", "मातृ दिवस", "गुरु शिष्य परंपरा", "अभी वक्त है", "बदलाव" ,"बंद बोरा", "पंखों की छतरी", "कलाकार", "वह उजाले वाला", "शक्ति विश्वास की", "ज्यादा ना रखना", "अब वह वक्त कहां", "सुख स्वप्न का" आदि कविताएं सामाजिक मानव मूल्यों एवं भाव की सशक्त लहरी है। उपर्युक्त कविताएं कवि के मन की विशेष भाव श्रृंखला की सुंदर अभिव्यक्ति है। लय तुक, शब्द चयन, भाषा शैली सुव्यवस्थित, रोचक एवं प्रवाहमयी है।

"अमी बरसे " शीर्षक की कविता की बानगी  प्रस्तुत है-

अमी बरसे/ बूंदे वर्षा की रिमझिम - रिमझिम /लगी गिरने / कण- कण  मुस्काता/ नजर आता/

प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने बरसात के मौसम का मनोहारी वर्णन किया है। आकाश से गिर रही बरसात की छोटी बूंदे धरा के कण-कण को तृप्त कर रही है। बरसात का यह मनोरम, हरियाला दृश्य कवि  अपनी आंखों में कैद कर लेना चाहते है।

जनक राज शर्मा जी का काव्य संग्रह नजरों के सामने "यथार्थ जीवन की संवेदनापूर्ण झलकियाँ " प्रस्तुत करता है। कवि ने प्रकाशित कविता संकलन में समाज का सच्चा स्वरूप प्रस्तुत किया है। संग्रह कि सहज, सरल, बोधगम्य भाषा शैली पाठक को अपनी ओर आकर्षित करती है। ईश्वर से कामना है कि आपका यह काव्य संग्रह समाज का पथ प्रदर्शक बने और आप ऐसी अनेक साहित्यिक पुस्तकों की रचना करते रहें। मां शारदे की असीम कृपा आप पर बनी रहें।

शुभकामनाओं सहित
नेहा शर्मा

श्याम आराधना

श्याम नाम लेते ही उबार देता है
सांवरा हर मुश्किल में संभाल लेता है
विपदा आए चाहे कितनी भी बड़ी
गिरने से पहले ही माधव हाथ मेरा थाम लेता है

नेहा शर्मा 

"मन के विविध भावों को दर्शाता काव्य संग्रह - आहटें अंतर्मन की"

समीक्ष्य कृति :  आहटें अंतर्मन की लेखक  :  पवन मित्तल विधा : काव्य प्रकाशक : मोनिका प्रकाशन,दिल्ली प्रथम संस्करण :  2021. ...