समीक्ष्य कृति : आहटें अंतर्मन की
लेखक : पवन मित्तल
विधा : काव्य
प्रकाशक : मोनिका प्रकाशन,दिल्ली
प्रथम संस्करण : 2021.
मूल्य : ₹ 450/-
पृष्ठ-136
समीक्षक- नेहा शर्मा
"मन के विविध भावों को दर्शाता काव्य संग्रह - आहटें अंतर्मन की"
" आहटें अंतर्मन" की कर्मठ व बहुमुखी प्रतिभा के धनी साहित्यकार पवन मित्तल जी का दूसरा काव्य संग्रह है। 109 कविताओं का यह काव्य संग्रह समाज के हर आयाम को गति प्रदान करता है। काव्य कृति में मां की ममता, देशभक्ति की भावना, रक्तदान, नेत्रदान, ग्रामीण परिवेश, धूम्रपान, भारतीय तीज- त्योहार की सोंधी महक, प्राकृतिक परिवेश का सुंदर चित्रण, नारी की पीड़ा आदि भावों का समावेश किया गया है। संकलन में सम्मिलित सभी कविताएं यथार्थ जीवन से उपजी हुई प्रतीत होती हैं। समाज का कोई भी छोर कवि की कलम से अछूता नहीं रह पाया है।
काव्य संकलन की प्रथम कविता "मां तेरा छोर नहीं" में
इन हाथों की थाप पाकर/ बन गया निशा से प्रभाकर/ तेरी तपस्या जीवन का मूल/ है शांति कहीं भी शोर नहीं/
उपर्युक्त पंक्तियां मन को झंकृत कर देती है। मां अपनी संतान को कच्चे घड़े से तराश कर पूर्ण आकार प्रदान करती है।माँ बच्चे के लिए पहली शिक्षिका होती है, जो जीवन की अच्छी या बुरी चीजों के बारे में सिखाती है।एक मां संपूर्ण जीवन निस्वार्थ भाव से अपना सर्वस्व संतान पर लुटाती रहती है।
"गांव का घर" शीर्षक कविता की एक बानगी प्रस्तुत है-
शायद पुरखों की आत्माएं/ और वो बीता बालपन उस आंगन की छवि को/ होने नहीं देता धूमिल /
प्रस्तुत पंक्तियों में कवि का0अपने पुश्तैनी मकान के प्रति असीम लगाव प्रदर्शित हुआ है, जो शहर में रहने के बाद भी अपने बचपन व पूर्वजों का ख्याल उन्हें विचलित कर देता है। वास्तव में व्यक्ति चाहे दुनिया के किसी भी कोने में क्यों ना चला जाए लेकिन जहां उसका बचपन बीता जिस मिट्टी में खेलते हुए वह बड़ा हुआ उसे सदैव अपने हृदय में सहेज कर रखता है।
कविता "नारी तू कमजोर नहीं" में
मै पूछना चाहती हूं कि/ क्या इस समाज में मेरा कोई अस्तित्व है/ या में बनी रहूंगी सदियों से सदियों तक/ तुम्हारे हाथों की कठपुतली/
उपर्युक्त पंक्तियों में नारी की मनःस्थिति का मार्मिक चित्रण प्रस्तुत किया गया है। नारी सदियों से रूढ़ीवादी बंधनों में जकड़ी रही है। सदैव नारी का शोषण होता रहा है । प्राचीन काल से आर्थिक, सामाजिक, साहित्यिक, धार्मिक सभी क्षेत्रों में नारी की अपेक्षा पुरूष का आधिपत्य रहा है। पुरुष ने अपने पुरुषत्व की श्रेष्ठता स्थापित करने के लिए स्त्री जाति पर मनमाने अत्याचार किए।
"पानी" शीर्षक कविता की बानगी प्रस्तुत है-
वो जल सेवा में/ रखवाये गए पानी के घड़े/ प्याऊ चढ़
गए भेट/ बाजारवाद की /अब खरीद कर /पीना पड़ता है पानी /जो कि हस्ताक्षर है/ बदलाव का /
उपर्युक्त कविता मे जल की अनमोल बूंद पर भी बाजारवाद का हावी होना दृष्टिगोचर हुआ है । आज से कुछ वर्षों पहले राहगीरों की आत्म तृप्ति हेतु प्याऊ पर जल के घड़े रखना पुण्य का कार्य समझा जाता था। लेकिन वर्तमान में बाजारवाद के कारण जल को बेचा जा रहा है। इंसानों की स्वार्थी प्रवृत्ति ने जीवनदायिनी जल की बूंद को भी उपभोक्तावाद व बाजारवाद का शिकार बना दिया है।
"रक्तदान का सफर" , "सूर्य की यात्रा", "वर्षा से गुहार", "छत" , "साहित्यकार", "बेटी", "जय भारत", "वक्त की गति", "मै तालाब", "बेनाम श्रम", " उदासीनता", "आंकड़े", "गति", "अवधारणा", "बेटी की पुकार" "पीड़ा" आदि सभी कविताएं सरल, सहज व सुव्यवस्थित ढंग से अभिव्यक्त की गई है। सभी कविताएं नव जागृति से प्रेरित व पाठक पर अपना अविस्मरणीय प्रभाव छोड़ती है। कविताओं में भाव - श्रृंखला की सुगम अभिव्यक्ति हुई है।
"राष्ट्रीय एकता" कविता में होगा स्वप्न साकार राष्ट्रीय एकता का / करने होंगे हम सभी को संयुक्त प्रयास/ कि समाज का कोई भी वर्ग/ स्वयं को राष्ट्र से अलग न समझे /
प्रस्तुत कविता में अखंड भारत के सुखद स्वप्न का वर्णन किया है। सदियों से भारत देश मे सभी जाति व धर्म के लोग प्रेम व भाईचारे के सूत्र में बंध कर जीवनयापन करते चले आ रहे थे।लेकिन अंग्रेजों की कुटिल कूटनीति के चलते भारत भूमि के दो टुकड़े हो गए। इसके पश्चात सांप्रदायिक दंगों का जहरीला नाग अपने फन फहराने लगा, जोअभी तक सक्रिय हैं। राष्ट्रीय एकता की भावना को जीवंत रखने के लिए हम सभी को जाति, धर्म, संप्रदाय जैसे संकुचित भावना से ऊपर उठकर आपसी सहयोग करना होगा।
साहित्यकार पवन मित्तल जी का काव्य संग्रह "आहटें अंतर्मन की" मन के विविध भावों को दर्शाता है। कवि ने काव्य कृति में अपने मन की भावनाओं को व्यक्त करने का प्रयास किया है । नवप्रकाशित काव्य संकलन को संगतिपूर्ण शब्दों के माध्यम से व्यवस्थित किया गया है। कवि ने सामाजिक, सांस्कृतिक, विचारात्मक व भावनात्मक आदि विषयों पर अपनी लेखनी चलाई है। प्रस्तुत काव्य संग्रह में रचित कविताएं हमारे जीवन में, समाज में व वर्तमान संदर्भो में अपनी उपयोगिता को दर्शाती है। ईश्वर से कामना है कि आपका यह कविता संकलन राष्ट्र व समाज के लिए मार्गदर्शक बने। विद्यादायिनी मां शारदे की कृपा बनी रहे।
शुभकामनाओं सहित
नेहा शर्मा
उत्कृष्ट समीक्षा.लेखक एवं समीक्षक दोनों को बधाई
जवाब देंहटाएंनेहा की समीक्षा बहुत उत्कृष्ट एवं उपादेय है
जवाब देंहटाएंपुस्तक के भाव सौंदर्य और शिल्प सौष्ठव पर सम्यक प्रकाश डालती है। शुभकामनाएं।